मंदबुद्धि बालक की विशेषताएं क्या है?HealthPlanet

Posted on Wed 8th Mar 2023 : 12:14

मानसिक दक्षता से वंचित बालक (मन्द बुद्धि बालक)

मानसिक दक्षता से वंचित या मन्द बुद्धि बालक वे होते हैं, जिनके सीखने की गति धीमी होती है और सीखकर भूल भी जाते हैं अर्थात् उनमें स्मरण क्षमता का अभाव होता है। ऐसे बालक मानसिक रूप से अस्वस्थ होते हैं, इनमें मौलिकता का अभाव होता है और नवीन समस्या पर विचार नहीं कर सकते। इनका व्यवहार असमायोजित होता है तथा समाज से पृथक् रहना चाहते हैं। इन्हें हताशा एवं निराशा का अनुभव होता है। ये सामान्य शिक्षण विधियों से शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सकते। इनकी मानसिक आयु कम होती है अर्थात् अपनी कक्षा और उससे भी नीचे की कक्षा का कार्य ठीक प्रकार से नहीं कर सकते।

इस प्रकार मन्द बुद्धि या मानसिक दक्षता से वंचित बालकों से अभिप्राय उन बालकों से है, जो सामान्य आयु तथा सामान्य स्तर के कार्य को करने में असमर्थ रहते हैं। ये बालक परिवार, विद्यालय तथा समुदाय में समायोजित नहीं हो पाते तथा इनमें हीन भावनाएँ तथा हीन ग्रन्थियाँ (Inferiority complex) उत्पन्न हो जाती हैं। बुद्धि लब्धि की दृष्टि से 20 से कम बुद्धि लब्धि (I.Q.) वाले बालकों को मानसिक दृष्टि से पिछड़ा या मानसिक दक्षता से वंचित माना जाता है। प्रारम्भ में इन बालकों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था वरन् इनकी बुद्धिहीनता को पूर्व संस्कारों का प्रभाव कहकर भाग्य पर छोड़ दिया जाता था किन्तु इनकी ओर अब ध्यान गया है और उनका उचित प्रबन्ध होने लगा है।

पश्चिमी देशों में पिछड़ेपन की परिभाषा देने में तथा पता लगाने में शारीरिक आयु (C.A.), मानसिक आयु (M.A.) तथा शैक्षणिक आयु(E.Q.) आदि का प्रयोग किया गया है किन्तु मनोवैज्ञानिक परीक्षणों के अभाव में तथा मानसिक आयु का ठीक-ठीक पता लगाने की असमर्थता के कारण हम पिछड़ेपन का पता लगाने में इसका प्रयोग नहीं कर सकते। अतः भारतीय बालकों के पिछड़ेपन की परिभाषा इस प्रकार की गयी है-“मानसिक रूप से मन्द बुद्धि या पिछड़ा बालक वह है जो एक या अधिक विषयों में बहुत कम काम कर रहा हो, यद्यपि उसकी आयु कक्षा की औसत आयु के लगभग बराबर हो।”

मंदबुद्धि बालक की परिभाषाएं

(1) मनोवैज्ञानिक बर्ट (Burt) के अनुसार-“पिछड़ा हुआ बालक वह है, जो शिक्षा सत्र (Session) के मध्य में अपनी आयु स्तर की कक्षा से एक दर्जे नीचे का कार्य न कर सके अर्थात् मान लिया, एक बालक आयु की दृष्टि से आठर्वी कक्षा में होना चाहिये। यदि वह बालक आठवीं कक्षा के मध्य में सातवीं कक्षा का कार्य करने में असफल है तो वह पिछड़ा हुआ बालक कहा जायेगा। दूसरे दृष्टिकोण से पिछड़ा हुआ बालक वह है जिसकी शैक्षणिक लब्धि 85 या कम हो।”

(2) क्रो एंड क्रो के अनुसार,“ मंदबुद्धि बालक मूढ़ होता है,अतः उसमें सोचने, समझने और विचार करने की शक्ति कम होती है। जिस बालक की बुद्धि लब्धि 70 से कम होती है उसे मंदबुद्धि बालक कहते हैं ।”

(3) जी डी पेज के अनुसार,“ मानसिक मंदता सामान्य या कम विकास की ऐसी अवस्था है जो बालक में बुद्धि संबंधी कमी या अक्षमता के लिए उत्तरदायी होती है ।”

मंदबुद्धि बालक के प्रकार / मानसिक अक्षमता के प्रकार / मानसिक मंदता के प्रकार

(1) छात्रों का कक्षा के कार्य के आधार पर

1. सामान्य पिछड़ापन (General backwardness)-जब कोई छात्र पाठ्यक्रम के प्रत्येक विषय में असफल रहता है तो वह सामान्य रूप से पिछड़ा हुआ बालक कहा जाता हैं।
2. विशिष्ट पिछड़पन (Specific backwardness)-जब छात्र पाठ्यक्रम के किसी एक विषय या क्षेत्र (Area of knowledge) में पिछड़ा हुआ है तो वह विशिष्ट क्षेत्र या विषय में पिछड़ा हुआ होता है।
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(2) सामान्य वर्गीकरण

(1) मन्दित मना बालक – ( बुद्धिलब्धि 70 से कम )
(2) धीमी गति से सीखने वाला बालक ( 70 – 85 बुद्धिलब्धि )
(3) बुद्धिलब्धि के आधार पर मंदबुद्धि बालक के प्रकार

(1) हीन बुद्धि बालक ( 70 – 89 बुद्धिलब्धि )
(2) मूर्ख बुद्धि बालक ( 59 – 69 बुद्धिलब्धि )
(3)मूढ़ बुद्धि बालक ( 25 – 49 बुद्धिलब्धि )
(4) जड़ बुद्धि बालक ( 0 – 24 बुद्धिलब्धि )

मन्द बुद्धि या मानसिक रूप से पिछड़े बालकों की विशेषताएँ

मन्द बुद्धि या मानसिक रूप से पिछड़े बालकों की प्रमुख विशिष्टताएँ या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

(1) बुद्धि परीक्षाओं के आधार पर पता लगा है कि इन बालकों की बुद्धि बहुत कमजोर होती है। (2) ये बालक सूक्ष्म विषयों पर विचार नहीं कर पाते। अत: गणित, व्याकरण तथा विज्ञान आदि के अध्ययन में रुचि नहीं लेते। (3) परीक्षा में बार-बार अनुत्तीर्ण होते हैं, जिससे आयु के अनुसार छोटी कक्षा में ही पढ़ते हैं। (4) अपने संवेगों पर नियन्त्रण नहीं रख पाते। (5) ये बौद्धिक कार्यों की अपेक्षा शारीरिक कार्यों में अधिक रुचि लेते हैं। (6) इनमें आत्म-विश्वास का अभाव रहता है।

(7) ये सामाजिक कार्यों को करने के योग्य नहीं होते और अपने को सदैव अयोग्य, निरर्थक तथा अपूर्ण समझते हैं । (8) यदि इनसे बात करें तो ये कहते कम हैं,सुनते अधिक हैं। (9) इन बालकों की संकल्प शक्ति अत्यन्त निर्बल होती है। अत: ये किसी बात का दृढ़ निश्चय नहीं कर पाते। (10) ये सीमित एवं साधारण रुचियाँ लिये होते हैं। (11) इनमें मौलिकता का अभाव होता है तथा ये सामान्यीकरण करने में अयोग्यता रखते हैं। (12) इनका अनैतिकता और अपराध की ओर भी झुकाव हो जाता है।

मन्द बुद्धि के कारण / मानसिक मंदता के कारण

मन्द बुद्धि या शैक्षिक पिछड़ेपन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

(1) मस्तिष्क में कमियों के आ जाने से मानसिकदोष आजाता है। मस्तिष्क कोशिकाओंनको बुखार के कारण, घाव या चोट लगना भी मन्द बुद्धि का कारण है। अनेक और बीमारियाँ; जैसे-आईटिस, एनिसिफलाईटिस, कोन निजिन्थल सिफलिस तथा जर्मन मीसलस आदि भी मानसिक पिछड़ेपन के लिये उत्तरदायी हो सकती हैं। इसके अतिरिक्त ऐपीलैप्सी तथा अधरंग एपीप्लैप्सी आदि बीमारियाँ भी इस दोष को जन्म देती हैं।

(2) व्यक्तित्व, संवेग तथा अन्य तथ्यनबालक की निष्पत्ति पर प्रभाव डालते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि कुछ पिछड़ापन व्यक्तित्व सम्बन्धी दोषों पर भी निर्भर करता है। एफरन (Aphron) के अनुसार पढ़ने में पिछड़ापन संवेगात्मक दोषों के कारण होता है। कुछ बालकों में यह छिपा होता है और इसका मनोविश्लेषणात्मक विधि (Psycho-analytical method) से पता लगाया जा सकता है। एफरन के अनुसार निष्पत्ति-परीक्षण (Achievement tests) के साथ-साथ अन्य परीक्षणों का प्रयोग भी मानसिक अक्षमता के कारणों को पता चलाने के लिये करना चाहिये।

(3) यह विचार सदैव ही लोकप्रिय रहा है कि मानसिक पिछड़ेपन का प्रमुख कारण वंशानुक्रम ही है। इस पिछड़ेपन का मुख्य अंश बालकों क। उनके माता-पिता के मानसिक पिछड़ेपन से मिलता है। बुद्धिहीनता पूर्वजों में भी मिलती है और इसका हस्तान्तरण बालकों में भी हो जाता है। इसका कारण गुणसूत्रों का दोष होता है।

(4) जिन बालकों के घर का वातावरण दोषयुक्त रहता।है, उनमें भावना-ग्रन्थि विकसित हो जाती है। पढ़ने में रुचि न होने के कारण ये बालक पिछड़ जाते हैं। इसका प्रमुख कारण घर में द्वेष, लड़ाई-झगड़े आदि होना है। संवेगों पर नियन्त्रण न कर पाने पर मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है और बालक कहीं भी समायोजन नहीं कर पाता।

(5) विद्यालय भी बालकों में पिछड़ेपन को विकसित करने में सहायक होते हैं। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित प्रकार से हैं-(i) बालकों के व्यक्तिगत भेदों पर ध्यान न देना। (ii) जो बालक बीमारी या अन्य कारणों से विद्यालय से उपस्थित रहते हैं, वे पिछड़ जाते हैं। अंत: उन पर विशेष ध्यान देकर उनके पिछड़े कार्यों को पूरा नहीं कराया जाना । (iii) जब बालकों को रोचक शिक्षण विधि से नहीं पढ़ाया जाता तो वे पाठ को नहीं समझ पाते और अन्य बालकों से पीछे रह जाते हैं।

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